चिलचिलाती धुप और निमाड़ मे चलने वाली लपटें सच मे असहनीय है। मेरा घर मध्य प्रदेश के निमाड़ मे आता है जहाँ की गर्मी उतनी ही प्रसिद्ध है जितना यहां का चिवडा एवं मिर्ची।
आज गर्मी की बात इसलिए कर रही हूँ क्योंकि आज मेरे साथ कुछ एसा हुआ जिसने मेरे मन में काफी सारे सवाल उठा दिये।
आज कल यहां बिजली कटौती अक्सर होती रहती है और घर के इनवर्टर की बेटरी के खराब होजाने के कारण वह भी गर्मी मे ज्यादा देर साथ नही दे पाता।
इसी से हाल बेहाल होने की वजह से मेरी बडबड काफी देर से चालु थी जिसे शान्त करने के लिए माँ बहुत देर से मुझे समझा रही थी। गुस्से से मैं घर के बाहर बरामदे मे बैठने चले गयी और तभी मेरी नज़र घर के गेट पर गयी । फोटोग्राफी करने की फिराक से मैं अपना फ़ोन ले कर बाहर गयी।
जा कर देखा तो घर के बगल मे लगा छोटा अकाव का पेड़ के नीचे एक गाय और उसका बछड़े को बैठा पाया । मैनें उनकी तस्वीर तो खिची पर देखकर मेरा मन जैसे हिल गया क्योंकि चारो और सिर्फ धुप थी और छाँव कहीं नही। वे पेड के नीचे उसी गर्मी से बचने के लिए बैठे थे,जिससे मै भी परेशान थी लेकिन कितना फर्क था न उनके पास बैठने के लिए जगह तक न थी और मेरे पास पुरा घर और छाव।

मैने आस पास देखा की शायद उनका मालिक कही दिख जाये पर कोई नही था। मैं विचलित हो कर उनके पास काफी देर तक बैठी रही । घर के सामने वही पुराना पीपल का पेड दिख रहा था जो अब पत्तियों से लद गया है लेकिन दिल मे दुख इस बात का था कि गाय चाह कर भी उसकी छाँव तक जा नही सकती क्योंकि मन्दिर परिसर मे जानवर न घुस पाये इसलिये लोगों ने चारो तरफ लोहे के तार लगवा दिये है।
पेड़ उन पक्षी और पक्षुओ के लिए ही तो होते है लेकिन आज वे ही उनकी छाँव मे बैठ नही पा रहे।
यह सब देख, मैं घर के अन्दर उन गायों के लिए रोटी और पानी लेने गयी , वापस आयी तब तक वै वहां से उठ आगे चल दी थी। मैने उनके पास जा कर उन्हे रोटियाँ तो खिला दी लेकिन मेरा मन वहीँ बैठ गया था।
इस वाक्यां के बाद यही लगा की हम कैसे छोटी छोटी चीजो जैसे बिजली कटौती, खाने मे नमक ज्यादा होना या एसी कई सारी बातो को ले कर अपने रोजमर्रा के जीवन मे क्रोधित और परेशान हो जाते है पर क्या सच मे हम उन चीजों के लिए परेशान है?
इन सब के बाद बस यही विनती करती हूँ की गर्मी मे अपने घर के बाहर पशु पक्षियों लिए पानी जरुर रखियेगा।
(खिची हुई तस्वीर भी यहा लगा रही हूँ )
तो समस्या यह है की कई बार लिखने बैठने पर मेरे साथ यही होता है की मुझसे कुछ नहीं होता !
मेरे घर के समाने लगा यह पीपल का पेड़ जिसकी छाँव मे मैने सारा बचपन बिताया है, इसके नीचे मोहल्ले का हर बच्चा भी खिलखिलाया है। आज इतने सालों बाद जब मैं इस लोकडाऊन के दौरान अपने घर पर हूँ, इन्ही दिनो छत से मैने जब इसे देखा तो बचपन के सारे वो पल जैसे कुछ मिनटों मे याद आ गये लेकिन कुछ अलग था इस बार।